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This Hindi essay explores the vision of Viksit Bharat 2047 with focus on rural development and employment generation. It analyzes schemes beyond MNREGA including Lakhpati Didi and PM Vishwakarma. The content covers skill development and women empowerment in rural India.

Description

विकसित भारत 2047 का संकल्प ग्रामीण सशक्तिकरण और रोजगार के नए आयाम

भारत अपनी स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष 2047 की ओर एक स्पष्ट और दूरदर्शी संकल्प के साथ बढ़ रहा है। विकसित भारत का स्वप्न केवल सकल घरेलू उत्पाद के आंकड़ों में वृद्धि करना नहीं है बल्कि देश के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के जीवन में गुणात्मक और स्थायी सुधार लाना है। महात्मा गांधी ने कहा था कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है और यह कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना स्वतंत्रता के समय था। देश की लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है और कृषि तथा संबद्ध क्षेत्र अभी भी करोड़ों परिवारों की आजीविका का मुख्य स्रोत हैं। ऐसी स्थिति में 2047 का विकास रोडमैप ग्रामीण सशक्तिकरण के बिना न केवल अधूरा है बल्कि असंभव भी है।

वर्तमान परिदृश्य में ग्रामीण रोजगार और आजीविका के पूरे ढांचे में एक ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिल रहा है। यह बदलाव मनरेगा की पारंपरिक भूमिका से आगे बढ़कर स्थायी रोजगार गारंटी कौशल विकास और उद्यमशीलता की ओर उन्मुख है। विकसित भारत गारंटी की नई अवधारणा इसी परिवर्तन का प्रतीक है जो ग्रामीण भारत को केवल लाभार्थी नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भागीदार बनाने पर केंद्रित है।

मनरेगा की ऐतिहासिक भूमिका और सीमाएं

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम जिसे मनरेगा के नाम से जाना जाता है वर्ष 2005 में लागू हुआ था। यह अधिनियम ग्रामीण भारत के लिए एक क्रांतिकारी कदम था क्योंकि इसने पहली बार रोजगार को कानूनी अधिकार का दर्जा दिया। इस योजना के तहत प्रत्येक ग्रामीण परिवार को वर्ष में कम से कम 100 दिनों के अकुशल शारीरिक श्रम की गारंटी दी गई। मनरेगा ने पिछले दो दशकों में ग्रामीण भारत को संकट के समय एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच प्रदान किया है। सूखे बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के दौरान जब कृषि कार्य प्रभावित होते थे तब मनरेगा ने लाखों परिवारों को भूख से बचाया।

इस योजना की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि इसने ग्रामीण से शहरी पलायन को काफी हद तक रोका। जब गांव में ही रोजगार मिलने लगा तो लोगों को रोजी रोटी के लिए अपना घर छोड़कर महानगरों की झुग्गियों में जाने की विवशता कम हुई। इसके अतिरिक्त मनरेगा ने ग्रामीण क्षेत्रों में न्यूनतम मजदूरी के मानक स्थापित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। निजी क्षेत्र को भी मनरेगा की मजदूरी दरों के अनुरूप भुगतान करना पड़ा जिससे ग्रामीण श्रमिकों की समग्र आय में वृद्धि हुई।

तथापि मनरेगा की कुछ मौलिक सीमाएं भी थीं जो 2047 के विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने में बाधक बन सकती हैं। सबसे पहली सीमा यह थी कि यह योजना केवल अकुशल श्रम पर केंद्रित थी। गड्ढे खोदना मिट्टी ढोना और सड़क निर्माण जैसे कार्य भले ही आवश्यक हों लेकिन ये श्रमिकों के कौशल विकास में कोई योगदान नहीं देते। दूसरी सीमा यह थी कि मनरेगा का उद्देश्य स्थायी रोजगार नहीं बल्कि अस्थायी राहत प्रदान करना था। तीसरी सीमा यह थी कि इस योजना के तहत निर्मित परिसंपत्तियों की गुणवत्ता और उपयोगिता पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।

विकसित भारत 2047 का संकल्प इन्हीं सीमाओं को पार करने और ग्रामीण रोजगार की एक नई परिभाषा गढ़ने पर केंद्रित है। अब जोर केवल काम देने पर नहीं बल्कि सार्थक और उत्पादक काम देने पर है जो व्यक्ति और समाज दोनों की प्रगति में योगदान दे।

विकसित भारत गारंटी की नई अवधारणा

विकसित भारत गारंटी की अवधारणा मनरेगा से मूलभूत रूप से अलग है। जहां मनरेगा का दर्शन यह था कि हर हाथ को काम मिले वहीं विकसित भारत गारंटी का दर्शन यह है कि हर हाथ को सम्मानजनक और उत्पादक काम मिले। यह केवल शब्दों का अंतर नहीं है बल्कि पूरे दृष्टिकोण का परिवर्तन है। विकसित भारत की सोच यह मानती है कि 2047 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनने के लिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को केवल सहारा नहीं बल्कि गति प्रदान करनी होगी।

इस नई अवधारणा के कई महत्वपूर्ण आयाम हैं। पहला आयाम है कौशल आधारित रोजगार पर बल। अब ग्रामीण युवाओं को केवल शारीरिक श्रम के अवसर नहीं बल्कि तकनीकी और व्यावसायिक प्रशिक्षण के माध्यम से बेहतर रोजगार के अवसर प्रदान किए जा रहे हैं। दूसरा आयाम है उद्यमशीलता को प्रोत्साहन। सरकार अब ग्रामीण युवाओं और महिलाओं को केवल नौकरी खोजने वाला नहीं बल्कि नौकरी देने वाला बनाना चाहती है। तीसरा आयाम है टिकाऊ परिसंपत्ति निर्माण। अब जोर केवल काम पूरा करने पर नहीं बल्कि ऐसी परिसंपत्तियां बनाने पर है जो दीर्घकाल तक उपयोगी रहें और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती दें।

विकसित भारत गारंटी के तहत ग्रामीण रोजगार को चार प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में संगठित किया जा रहा है। पहला क्षेत्र है जल सुरक्षा जिसमें तालाबों का निर्माण वर्षा जल संचयन और सिंचाई अवसंरचना का विकास शामिल है। दूसरा क्षेत्र है मूलभूत ग्रामीण अवसंरचना जिसमें सड़कें पंचायत भवन और सामुदायिक केंद्र शामिल हैं। तीसरा क्षेत्र है आजीविका संबंधी अवसंरचना जिसमें कृषि विपणन केंद्र प्रसंस्करण इकाइयां और भंडारण गृह शामिल हैं। चौथा क्षेत्र है जलवायु अनुकूलन जिसमें चरम मौसमी घटनाओं से निपटने के लिए विशेष कार्य शामिल हैं।

लखपति दीदी योजना और महिला सशक्तिकरण

ग्रामीण सशक्तिकरण की कोई भी रणनीति महिलाओं की भागीदारी के बिना सफल नहीं हो सकती। भारत के गांवों में महिलाएं न केवल घर की जिम्मेदारियां संभालती हैं बल्कि कृषि और पशुपालन में भी पुरुषों के बराबर या उससे अधिक योगदान देती हैं। तथापि परंपरागत रूप से उनके इस योगदान को न तो मान्यता मिली और न ही उचित आर्थिक प्रतिफल। लखपति दीदी योजना इसी असंतुलन को दूर करने की एक महत्वाकांक्षी पहल है।

इस योजना का लक्ष्य स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को इतना सक्षम बनाना है कि वे प्रतिवर्ष कम से कम एक लाख रुपये की आय अर्जित कर सकें। यह मनरेगा के दिहाड़ी मजदूर मॉडल से पूर्णतया भिन्न है। मनरेगा में महिला एक श्रमिक के रूप में काम करती थी और दिन के अंत में उसे मजदूरी मिलती थी। लखपति दीदी योजना में महिला एक उद्यमी के रूप में उभरती है जो स्वयं का व्यवसाय चलाती है और दूसरों को भी रोजगार देती है।

इस योजना के तहत महिलाओं को बहुआयामी सहायता प्रदान की जाती है। पहला स्तंभ है कौशल प्रशिक्षण जिसमें सिलाई कढ़ाई खाद्य प्रसंस्करण मशरूम उत्पादन मुर्गी पालन और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों का प्रशिक्षण दिया जाता है। दूसरा स्तंभ है वित्तीय समावेशन जिसमें बैंक खाते बीमा और ऋण सुविधाएं आसान शर्तों पर उपलब्ध कराई जाती हैं। तीसरा स्तंभ है बाजार संपर्क जिसमें उत्पादों को बेचने के लिए स्थानीय हाटों से लेकर ई कॉमर्स प्लेटफॉर्म तक पहुंच सुनिश्चित की जाती है।

लखपति दीदी योजना का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह केवल आर्थिक सशक्तिकरण तक सीमित नहीं है बल्कि इसका सामाजिक प्रभाव भी गहरा है। जब एक महिला आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होती है तो उसका आत्मविश्वास बढ़ता है और परिवार तथा समाज में उसकी निर्णय लेने की शक्ति भी बढ़ती है। यह बदलाव अगली पीढ़ी की लड़कियों के लिए भी प्रेरणादायक होता है जो देखती हैं कि उनकी माताएं और दादी नानी घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर सम्मान के साथ अपनी पहचान बना रही हैं।

नमो ड्रोन दीदी और कृषि में तकनीकी क्रांति

कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है लेकिन परंपरागत रूप से यह क्षेत्र प्रौद्योगिकी के मामले में पिछड़ा रहा है। विकसित देशों में जहां एक किसान सैकड़ों हेक्टेयर भूमि पर आधुनिक मशीनों से खेती करता है वहीं भारत में अधिकांश किसान अभी भी पारंपरिक तरीकों पर निर्भर हैं। नमो ड्रोन दीदी योजना इसी तकनीकी खाई को पाटने का एक अभिनव प्रयास है जो साथ ही साथ ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी सृजित करता है।

इस योजना के तहत स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को ड्रोन संचालन का प्रशिक्षण दिया जाता है। प्रशिक्षित महिलाएं फिर किसानों को ड्रोन आधारित सेवाएं प्रदान करती हैं जैसे कीटनाशक छिड़काव उर्वरक वितरण और फसल स्वास्थ्य निगरानी। यह व्यवस्था सभी पक्षों के लिए लाभदायक है। किसानों को कम लागत में बेहतर और समान छिड़काव मिलता है जिससे फसल उत्पादकता बढ़ती है। महिलाओं को एक सम्मानजनक और अच्छी आय वाला रोजगार मिलता है। और देश की कृषि व्यवस्था तकनीकी रूप से उन्नत होती है।

इस योजना का एक गहरा सामाजिक महत्व भी है। परंपरागत रूप से तकनीक का क्षेत्र पुरुष वर्चस्व वाला माना जाता रहा है। जब ग्रामीण महिलाएं ड्रोन उड़ाती हैं तो यह न केवल लैंगिक रूढ़ियों को तोड़ता है बल्कि युवा पीढ़ी के लिए एक नया आदर्श भी प्रस्तुत करता है। यह संदेश जाता है कि प्रौद्योगिकी किसी के लिए भी सुलभ है और ग्रामीण पृष्ठभूमि या लिंग इसमें कोई बाधा नहीं है।

पीएम विश्वकर्मा योजना और पारंपरिक शिल्प का पुनर्जागरण

भारत के गांवों में सदियों से विभिन्न पारंपरिक शिल्पकार और कारीगर निवास करते आए हैं। लोहार सुनार कुम्हार बढ़ई नाई धोबी और अनेक अन्य पेशेवर ग्रामीण अर्थव्यवस्था के अभिन्न अंग रहे हैं। औद्योगीकरण और शहरीकरण के कारण इन पारंपरिक व्यवसायों पर संकट आया और कई कारीगर परिवार अपना पुश्तैनी पेशा छोड़कर मजदूरी करने को विवश हुए। पीएम विश्वकर्मा योजना इन्हीं कारीगरों को पुनः सम्मान और समृद्धि दिलाने की पहल है।

इस योजना के तहत 18 पारंपरिक व्यवसायों को चिह्नित किया गया है और इनसे जुड़े कारीगरों को व्यापक सहायता प्रदान की जा रही है। पहला घटक है पहचान और पंजीकरण जिसमें कारीगरों को एक विश्वकर्मा प्रमाण पत्र और पहचान पत्र जारी किया जाता है। दूसरा घटक है कौशल उन्नयन जिसमें पारंपरिक कौशल को आधुनिक तकनीकों और बाजार की आवश्यकताओं के अनुरूप अद्यतन किया जाता है। तीसरा घटक है आधुनिक उपकरण जिसमें कारीगरों को बेहतर और कुशल टूलकिट प्रदान की जाती है। चौथा घटक है वित्तीय सहायता जिसमें रियायती ब्याज दरों पर ऋण उपलब्ध कराया जाता है।

यह योजना केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है बल्कि इसका उद्देश्य पारंपरिक शिल्प को एक संगठित उद्योग का रूप देना है। जब एक कुम्हार मिट्टी के बर्तनों के स्थान पर सजावटी वस्तुएं बनाना सीखता है और उन्हें ऑनलाइन बेचता है तो उसकी आय कई गुना बढ़ जाती है। जब एक लोहार पारंपरिक कृषि उपकरणों के अतिरिक्त आधुनिक डिजाइन की लोहे की कलाकृतियां बनाता है तो उसे शहरी बाजारों में भी ग्राहक मिलते हैं। यही विकसित भारत गारंटी का मूल उद्देश्य है कि पारंपरिक को आधुनिक से जोड़कर एक नई संभावना का सृजन किया जाए।

दीनदयाल अंत्योदय योजना और स्वरोजगार

दीनदयाल अंत्योदय योजना राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन जिसे संक्षेप में DAY NRLM कहा जाता है ग्रामीण गरीबी उन्मूलन का एक व्यापक कार्यक्रम है। यह योजना मान्यता देती है कि गरीबी केवल आय की कमी नहीं है बल्कि अवसरों संसाधनों और क्षमताओं की कमी भी है। इसलिए इसका दृष्टिकोण बहुआयामी है जो केवल पैसा देने के बजाय लोगों को पैसा कमाने में सक्षम बनाने पर केंद्रित है।

इस योजना का एक महत्वपूर्ण घटक है स्टार्टअप ग्राम उद्यमिता कार्यक्रम जिसे SVEP कहा जाता है। इस कार्यक्रम के तहत ग्रामीण उद्यमियों को व्यवसाय शुरू करने के लिए प्रशिक्षण मार्गदर्शन और वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। इसका उद्देश्य गांवों में गैर कृषि उद्यमों को बढ़ावा देना है जैसे किराना दुकान ब्यूटी पार्लर मरम्मत सेवाएं और छोटे विनिर्माण। जब गांव में ही इस प्रकार की सेवाएं उपलब्ध होती हैं तो न केवल उद्यमी को आय होती है बल्कि ग्रामीणों को भी इन सेवाओं के लिए शहर जाने की आवश्यकता नहीं रहती।

DAY NRLM का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू है सामुदायिक संस्थाओं का निर्माण। स्वयं सहायता समूहों को ग्राम संगठनों में और ग्राम संगठनों को ब्लॉक स्तरीय संघों में संगठित किया जाता है। यह पिरामिड संरचना ग्रामीण महिलाओं को एक शक्तिशाली सामूहिक आवाज देती है। जब हजारों महिलाएं मिलकर किसी मुद्दे पर बात करती हैं तो सरकार और बाजार दोनों उन्हें सुनने को बाध्य होते हैं।

कृषि आधुनिकीकरण और किसान कल्याण

विकसित भारत 2047 के लक्ष्य में कृषि क्षेत्र का आधुनिकीकरण सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। भारत में कृषि केवल एक आर्थिक गतिविधि नहीं है बल्कि यह करोड़ों परिवारों की पहचान और जीवनशैली से जुड़ी है। तथापि कृषि की वर्तमान स्थिति चिंताजनक है। छोटी जोत घटती उर्वरता जलवायु परिवर्तन की चुनौतियां और बाजार की अनिश्चितताएं किसानों के लिए खेती को लाभकारी बनाए रखना कठिन बना रही हैं। विकसित भारत गारंटी के तहत इन सभी चुनौतियों का समाधान खोजा जा रहा है।

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को बढ़ावा देना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। जब किसान अपनी उपज को कच्चे माल के रूप में बेचता है तो उसे बहुत कम दाम मिलते हैं। लेकिन जब वही उपज प्रसंस्करण के बाद अचार पापड़ चिप्स या जूस के रूप में बिकती है तो उसका मूल्य कई गुना बढ़ जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित करने से किसानों को बेहतर दाम मिलेंगे और स्थानीय युवाओं को रोजगार भी मिलेगा।

जैविक खेती एक अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्र है जिसमें भारत को प्राकृतिक लाभ प्राप्त है। पूरे विश्व में जैविक उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है और उपभोक्ता इनके लिए अधिक दाम देने को तैयार हैं। भारतीय किसान जो पीढ़ियों से प्राकृतिक खेती करते आए हैं वे इस बाजार में अच्छी स्थिति में हैं। सरकार जैविक प्रमाणन को सरल बनाकर और बाजार संपर्क सुनिश्चित करके किसानों की आय बढ़ाने का प्रयास कर रही है।

पीएम कुसुम योजना किसानों को अन्नदाता से ऊर्जादाता बनाने की एक अभूतपूर्व पहल है। इस योजना के तहत किसान अपने खेतों में सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित कर सकते हैं। इससे उत्पन्न बिजली का उपयोग वे सिंचाई के लिए कर सकते हैं और अतिरिक्त बिजली को ग्रिड में बेचकर आय अर्जित कर सकते हैं। यह व्यवस्था किसानों को एक स्थिर और अतिरिक्त आय का स्रोत प्रदान करती है जो मौसम और फसल की अनिश्चितताओं से मुक्त है।

डिजिटल ग्रामीण भारत और शासन में पारदर्शिता

विकसित भारत 2047 की परिकल्पना में डिजिटल प्रौद्योगिकी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। डिजिटल इंडिया अभियान ने पिछले कुछ वर्षों में ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट और मोबाइल की पहुंच में क्रांतिकारी सुधार किया है। अब ग्रामीण भारत में भी लोग ऑनलाइन बैंकिंग डिजिटल भुगतान और ई कॉमर्स का उपयोग करने लगे हैं। यह बदलाव न केवल सुविधा का है बल्कि सशक्तिकरण का भी है।

शासन के क्षेत्र में डिजिटलीकरण ने पारदर्शिता और जवाबदेही में उल्लेखनीय सुधार किया है। मनरेगा में मजदूरी का भुगतान अब सीधे बैंक खातों में होता है जिससे बिचौलियों की भूमिका समाप्त हो गई है। लाभार्थियों की पहचान आधार से जुड़ी है जिससे फर्जीवाड़े में कमी आई है। भू अभिलेखों का डिजिटलीकरण किसानों के लिए ऋण प्राप्त करना आसान बना रहा है। ये सभी परिवर्तन मिलकर एक ऐसा वातावरण बना रहे हैं जहां सरकारी योजनाओं का लाभ सही लाभार्थियों तक पहुंचता है।

अपितु डिजिटल विभाजन की चुनौती अभी भी बनी हुई है। बहुत से ग्रामीण विशेषकर वृद्ध और अनपढ़ लोग डिजिटल उपकरणों का उपयोग करने में असमर्थ हैं। इसलिए सरकार कॉमन सर्विस सेंटर के माध्यम से इन लोगों को सहायता प्रदान कर रही है जहां प्रशिक्षित कर्मचारी डिजिटल सेवाओं में मदद करते हैं। इसके साथ ही डिजिटल साक्षरता कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं ताकि धीरे धीरे सभी ग्रामीण स्वयं इन सेवाओं का उपयोग कर सकें।

चुनौतियां और आगे का मार्ग

विकसित भारत 2047 की राह में अनेक चुनौतियां हैं जिनका समाधान किया जाना आवश्यक है। पहली चुनौती है कार्यान्वयन की। सरकार की अनेक योजनाएं कागजों पर उत्कृष्ट हैं लेकिन जमीनी स्तर पर उनका क्रियान्वयन कमजोर रहता है। इसके लिए स्थानीय प्रशासन की क्षमता निर्माण और नियमित निगरानी आवश्यक है।

दूसरी चुनौती है समन्वय की। विभिन्न मंत्रालयों और विभागों की योजनाएं एक दूसरे से स्वतंत्र रूप से चलती हैं जिससे संसाधनों का दोहराव होता है और लाभार्थियों को भ्रम होता है। विकसित भारत गारंटी को प्रभावी बनाने के लिए इन सभी योजनाओं का एकीकृत और समन्वित कार्यान्वयन आवश्यक है।

तीसरी चुनौती है वित्तपोषण की। ग्रामीण विकास की योजनाओं के लिए विशाल धनराशि की आवश्यकता है। सरकारी बजट की अपनी सीमाएं हैं इसलिए निजी निवेश और सार्वजनिक निजी भागीदारी को प्रोत्साहित करना होगा। कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत कंपनियों को भी ग्रामीण विकास में योगदान के लिए प्रेरित किया जा सकता है।

चौथी चुनौती है जलवायु परिवर्तन की। बदलते मौसम पैटर्न अतिवृष्टि सूखा और तापमान में वृद्धि कृषि और ग्रामीण आजीविका को प्रभावित कर रहे हैं। विकसित भारत की योजनाओं में जलवायु अनुकूलन को प्राथमिकता देनी होगी ताकि ग्रामीण समुदाय इन परिवर्तनों का सामना कर सकें।

उपसंहार

विकसित भारत 2047 का मार्ग ग्रामीण गलियों से होकर ही जाता है। यह एक ऐसा सत्य है जिसे कोई भी नीति निर्माता अनदेखा नहीं कर सकता। मनरेगा ने दो दशक पहले एक महत्वपूर्ण आधार तैयार किया था जिसने ग्रामीण भारत को संकट के समय सुरक्षा प्रदान की। अब उस आधार पर समृद्धि की इमारत खड़ी करने का समय है। लखपति दीदी नमो ड्रोन दीदी पीएम विश्वकर्मा और दीनदयाल अंत्योदय जैसी योजनाएं इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

विकसित भारत गारंटी की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि हम ग्रामीण भारत को केवल सहायता का पात्र नहीं बल्कि विकास का भागीदार मानें। जब ग्रामीण युवा शिक्षित कुशल और उद्यमी होंगे तब वे स्वयं अपने भाग्य के निर्माता बनेंगे और साथ ही राष्ट्र निर्माण में भी योगदान देंगे। जब ग्रामीण महिलाएं आर्थिक रूप से स्वतंत्र होंगी तब न केवल उनके परिवार बल्कि पूरे समुदाय में परिवर्तन आएगा। जब गांव आर्थिक गतिविधियों के केंद्र बनेंगे तब शहरों पर दबाव कम होगा और संतुलित क्षेत्रीय विकास संभव होगा।

2047 का स्वतंत्रता शताब्दी वर्ष भारत के लिए एक ऐतिहासिक अवसर है। यह वह समय है जब हम अपने स्वतंत्रता सेनानियों के स्वप्न को साकार कर सकते हैं जिन्होंने एक ऐसे भारत की कल्पना की थी जहां हर नागरिक सम्मान और समृद्धि से जीवन जी सके। ग्रामीण सशक्तिकरण इस स्वप्न को साकार करने की कुंजी है। कौशल विकास तकनीकी एकीकरण महिला उद्यमिता और टिकाऊ आजीविका पर केंद्रित विकसित भारत गारंटी की योजनाएं ही ग्रामीण भारत को सच्चे अर्थों में सशक्त बनाएंगी। जब हमारे गांव आत्मनिर्भर और समृद्ध होंगे तभी भारत वास्तविक रूप से एक विकसित राष्ट्र के रूप में विश्व पटल पर उभरेगा।


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संदर्भ: https://viksitindia.com/
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