AI Future Innovations 2025:
एआई एजेंट्स का क्रांतिकारी विकास: पैरेलल वर्कफ़्लो
आजकल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की क्षमताओं को बढ़ाने के लिए एक नई और क्रांतिकारी दिशा सामने आ रही है, जिसे पैरेलल एजेंट्स (समानांतर एजेंट्स) कहा जाता है। अब तक, एआई के काम करने के तरीक़े में सुधार लाने के लिए मुख्य रूप से दो ही तरीक़े इस्तेमाल होते थे:
- एआई मॉडल को बहुत ज़्यादा डेटा पर प्रशिक्षित करना; और
- इसके लिए अत्यधिक कंप्यूटिंग शक्ति का उपयोग करना।
ये तरीक़े काफ़ी प्रभावी थे, लेकिन इनकी अपनी सीमाएँ थीं। अब एक बिलकुल नया तरीक़ा तेज़ी से लोकप्रिय हो रहा है, जिसमें कई ‘एआई एजेंट्स’ को एक ही समय पर साथ-साथ काम में लगाकर उनके कार्य-प्रदर्शन को और भी बेहतर बनाया जा सकता है।
इस तकनीक को गहराई से समझने के लिए, यह जानना ज़रूरी है कि लार्ज लैंग्वेज मॉडल (एलएलएम) कैसे काम करते हैं। ये मॉडल किसी भी टेक्स्ट को स्वाभाविक रूप से क्रमानुसार (यानी, एक-एक करके) बनाते हैं। जब आप उनसे कोई सवाल पूछते हैं, तो वे एक-एक शब्द को जोड़कर एक पूरा जवाब तैयार करते हैं, जिसमें काफ़ी समय लग सकता है। इसी तरह, ज़्यादातर एआई-आधारित वर्कफ़्लोस (कार्य-प्रणालियाँ) भी शुरुआत में एक के बाद एक चरण पूरा करके ही काम करती हैं। उदाहरण के लिए, अगर किसी एआई को एक लंबी रिपोर्ट लिखनी है, तो वह पहले रिसर्च करेगा, फिर उसका विश्लेषण करेगा और उसके बाद ही लिखना शुरू करेगा।
लेकिन समय के साथ, प्रति टोकन (यानी, प्रति शब्द) एलएलएम की लागत बहुत कम होती जा रही है, और कंपनियाँ अपने ग्राहकों को तेज़ी से नतीजे देना चाहती हैं। इसी ज़रूरत को देखते हुए, इन एआई वर्कफ़्लोस को अब पैरेलल (समानांतर) रूप से चलाया जा रहा है। इसका सीधा और सरल मतलब है कि एक जटिल कार्य को अब कई एआई एजेंट्स द्वारा एक साथ और तेज़ी से पूरा किया जा सकता है। यह तकनीक इस सिद्धांत पर काम करती है कि एक बड़े और मुश्किल काम को छोटे-छोटे हिस्सों में बाँट दिया जाए और फिर हर हिस्से को एक अलग एजेंट द्वारा पूरा कराया जाए। यह तरीक़ा कुछ ऐसा है, जैसे किसी बड़े प्रोजेक्ट पर एक इंसान के बजाय कई लोग मिलकर काम करें। इससे न सिर्फ़ काम की गति बढ़ती है, बल्कि नतीजे भी ज़्यादा सटीक और विस्तृत होते हैं।
गूगल का नया फ़ोन: एआई की सक्रिय मदद से लैस
आजकल, मोबाइल फ़ोन केवल बातचीत करने या मैसेज भेजने तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि वे एक बुद्धिमान साथी की तरह काम कर रहे हैं। इस बदलाव की सबसे ताज़ा मिसाल गूगल का नया स्मार्टफ़ोन ‘पिक्सल 10’ है, जो एक ऐसे एआई असिस्टेंट के साथ आया है जो यूज़र की ज़रूरतों को पहले से ही भांप लेता है। यह असिस्टेंट बिना किसी कमांड या प्रॉम्प्ट के, खुद ही मददगार जानकारी दिखाता है।
गूगल ने अपने ‘पिक्सल 10’ के साथ ‘मैजिक क्यू’ नाम का एक एआई-संचालित सिस्टम पेश किया है। यह सिस्टम फ़ोन कॉल, मैसेज भेजने और अन्य तरह के इंटरैक्शन के दौरान प्रासंगिक (रिलेवेंट) और ज़रूरी जानकारी अपने आप दिखाता है। यह जानकारी सीधे फ़ोन में मौजूद अन्य एप्लीकेशन्स से ली जाती है। उदाहरण के लिए, जब आप किसी से मैसेज पर अपनी यात्रा के बारे में बात कर रहे हों, तो यह सिस्टम आपकी टिकट और यात्रा से जुड़ी तारीखें, समय, और उड़ान की जानकारी तुरंत स्क्रीन पर दिखा देता है। यह सिस्टम यूज़र के व्यवहार को लगातार ट्रैक करता है और सक्रिय रूप से जानकारी उपलब्ध कराता है, जिससे आपका समय बचता है और अनुभव और भी सहज हो जाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह सिस्टम बिना किसी वेक वर्ड (जैसे ‘हे गूगल‘) के बैकग्राउंड में काम करता है, ताकि आपका काम बिना किसी रुकावट के चलता रहे।
एआई का पर्यावरण पर प्रभाव: मिस्ट्रल का बड़ा क़दम
फ़्रांसीसी आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस (एआई) कंपनी ‘मिस्ट्रल’, जो लार्ज लैंग्वेज मॉडल (एलएलएम) बनाने के लिए जानी जाती है, ने अपने एक प्रमुख मॉडल के पर्यावरणीय प्रभावों को मापा है। यह अध्ययन दर्शाता है कि एआई के विकास की एक बड़ी लागत हमारे ग्रह को चुकानी पड़ रही है, और इस पर ध्यान देना अब बेहद ज़रूरी हो गया है।
‘मिस्ट्रल’ ने अपने ‘मिस्ट्रल लार्ज 2’ (123 अरब पैरामीटर्स) नामक मॉडल का एक विस्तृत पर्यावरणीय विश्लेषण प्रकाशित किया है। इस विश्लेषण में, कंपनी ने बताया कि मॉडल को बनाने और चलाने में कितने ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन हुआ, कितना पानी इस्तेमाल हुआ और प्राकृतिक संसाधनों की कितनी खपत हुई। इस तरह का अध्ययन करने का कंपनी का मुख्य उद्देश्य एआई मॉडलों के पर्यावरणीय प्रभाव को मापने के लिए एक मानक (स्टैण्डर्ड) स्थापित करना है। इसका मतलब है कि भविष्य में कोई भी कंपनी अपने एआई मॉडल के पर्यावरणीय प्रदर्शन की तुलना इस मानक से कर सकती है।
इस अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष बेहद चौंकाने वाले हैं:
- मॉडल को प्रशिक्षित (ट्रैन) करने और चलाने की प्रक्रिया से ही कुल5% ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन हुआ और 91% पानी की खपत हुई। यह दर्शाता है कि एआई का सबसे ज़्यादा पर्यावरणीय बोझ उसके प्रशिक्षण और संचालन से आता है।
- इसके विपरीत, सर्वर के निर्माण, परिवहन और अन्य संबंधित कार्यों से केवल 11% ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और 5% पानी की खपत हुई।
ये आँकड़े इस बात को साबित करते हैं कि एआई बहुत ज़्यादा ऊर्जा और पानी का उपयोग करता है। इसलिए, मॉडलों को प्रशिक्षित करने और चलाने के लिए ऐसे तरीक़े खोजना बहुत ज़रूरी है जो अधिक कुशल हों। ‘मिस्ट्रल’ का यह प्रयास शोधकर्ताओं और व्यवसायों को अलग-अलग मॉडलों की तुलना करने और पर्यावरण के लिए ज़्यादा अनुकूल एआई बनाने में मदद करेगा। यदि यह तरीक़ा बड़े पैमाने पर अपनाया जाता है, तो यह एआई उद्योग को और ज़्यादा ज़िम्मेदार और टिकाऊ बनाने में एक बड़ी भूमिका निभाएगा।
रोबोट मृग: वन्यजीव अनुसंधान का भविष्य
रोबोटिक्स और आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस (एआई) का उपयोग अब केवल फैक्ट्रियों या घरों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और वन्यजीव अनुसंधान में भी क्रांतिकारी बदलाव ला रहा है। हाल ही में, चीन में शोधकर्ताओं ने ‘तिब्बती मृग’ का अध्ययन करने के लिए एक अनोखा तरीक़ा अपनाया है, जिसमें एक रोबोट को मृग के झुंड में शामिल किया गया है। यह तरीक़ा वैज्ञानिकों को इन शर्मीले जानवरों को उनके प्राकृतिक आवास में बिना परेशान किए क़रीब से देखने और उनके व्यवहार को समझने की सुविधा देता है, जो पारंपरिक मानव-आधारित अवलोकन से कहीं ज़्यादा सटीक और कम व्यवधान पैदा करने वाला है।
यह रोबोट ‘डीप रोबोटिक्स एक्स 30’ नामक एक रोबोट मॉडल पर आधारित है। इसे विशेष रूप से औद्योगिक निरीक्षण (इंडस्ट्रियल इंस्पेक्शन) और खोज-और-बचाव (सर्च एंड रेस्क्यू) जैसे कठिन कार्यों के लिए डिज़ाइन किया गया है। इसकी सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि यह रोबोट मुश्किल से मुश्किल रास्तों पर भी आसानी से चल सकता है, और यह बेहद ठंडे या गर्म मौसम में भी अपनी दक्षता के साथ काम कर सकता है। रोबोट में कई उन्नत सेंसर लगे हैं, जैसे कैमरे, लाइडार, अल्ट्रासोनिक सेंसर और एक जीपीएस सिस्टम। ये सेंसर रोबोट को आसपास के वातावरण का विस्तृत मैप बनाने, बाधाओं से बचने, और अपनी सटीक स्थिति को ट्रैक करने में मदद करते हैं। यह रोबोट झुंड की हरकतों, उनके खाने-पीने और प्रजनन (रिप्रोडक्शन) को ट्रैक करता है, और यह सारी जानकारी 5जी रेडियो के माध्यम से वैज्ञानिकों को भेजता है। यदि यह रोबोट झुंड को सड़क के पास देखता है, तो यह तुरंत एक चेतावनी भेजता है ताकि ऑपरेटर ट्रैफ़िक को नियंत्रित कर सकें और जानवरों को सुरक्षित रूप से सड़क पार करने दें। यह रोबोटिक्स और वन्यजीव संरक्षण के बीच एक अद्भुत सहयोग का उदाहरण है।
स्व–पर्यवेक्षित लर्निंग: एआई को बिना लेबल वाली तस्वीरों से सिखाने का तरीक़ा
आजकल, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के विकास में सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है लेबल वाला डेटा। इसका मतलब है कि कंप्यूटर को सिखाने के लिए हर तस्वीर या वीडियो पर यह जानकारी देनी पड़ती है कि उसमें क्या-क्या है। यह प्रक्रिया बहुत लंबी और महंगी होती है। इसी समस्या का हल निकालने के लिए स्व–पर्यवेक्षित लर्निंग (सेल्फ सुपेर्विसेड लर्निंग) नामक एक नई तकनीक सामने आई है।
इसी दिशा में, ‘मेटा‘ और अन्य संस्थानों के शोधकर्ताओं ने ‘डीआईएनओवी3‘ नाम का एक नया एआई मॉडल जारी किया है। यह मॉडल इस बात का जीता-जागता उदाहरण है कि बिना लेबल वाली तस्वीरों पर प्रशिक्षित होने के बावजूद, एआई कितना बेहतर काम कर सकता है।
यह नया मॉडल अपने पिछले वर्ज़न से 6 गुना ज़्यादा पैरामीटर्स पर प्रशिक्षित किया गया है और इसके लिए बहुत ज़्यादा डेटा का इस्तेमाल हुआ है। इसकी सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि यह दो ख़ास कामों में शानदार परफ़ॉर्मेंस देता है:
- इमेज सेगमेंटेशन: इस तकनीक से एआई किसी भी तस्वीर में मौजूद अलग-अलग चीज़ों को पहचान कर उन्हें अलग कर सकता है। उदाहरण के लिए, यह किसी तस्वीर में इंसान, पेड़ और घर को अलग-अलग पहचान कर सकता है।
- डेप्थ एस्टिमेशन: इस तकनीक से मॉडल यह अंदाज़ा लगा सकता है कि किसी तस्वीर में कौन सी चीज़ कितनी दूर है। इससे तस्वीर में गहराई (डेप्थ) का पता चलता है, जैसे कोई चीज़ कैमरे के क़रीब है या दूर।
स्व–पर्यवेक्षित लर्निंग विज़ुअल एआई के लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इंटरनेट पर टेक्स्ट डेटा की तुलना में बिना लेबल वाला इमेज और वीडियो डेटा बहुत ज़्यादा उपलब्ध है। यह नया मॉडल दर्शाता है कि इस विशाल डेटा भंडार का उपयोग करके भी एआई की परफ़ॉर्मेंस को काफी बढ़ाया जा सकता है। यह एआई के क्षेत्र में एक बहुत ही महत्वपूर्ण क़दम है क्योंकि अब हमें एआई को सिखाने के लिए हर बार नए लेबल वाले डेटा पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
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