Description
Ethics Is Integrity of Choice Hindi Essay
नैतिकता तब तक नहीं आजमाई जाती जब तक आपके पास विकल्प न हो
(स्वतंत्रता, विकल्प और नैतिक दायित्व का दार्शनिक विवेचन)
प्रस्तावना: नैतिकता की पूर्व–शर्त
क्या एक सलाखों के पीछे जकड़ा हुआ कैदी इसलिए ‘साधु’ है क्योंकि वह किसी की हत्या नहीं कर रहा? क्या एक अत्यंत निर्धन व्यक्ति, जिसके पास भोजन का एक दाना भी नहीं है, इसलिए ‘त्यागी’ माना जा सकता है क्योंकि वह उपवास कर रहा है? क्या एक कंप्यूटर, जो प्रोग्रामिंग के अनुसार गणना करता है, ‘ईमानदार’ है क्योंकि वह कभी हेराफेरी नहीं करता?
इन सभी प्रश्नों का उत्तर एक ही है: नहीं।
नैतिकता (ETHICS) निर्वात या शून्यता में अस्तित्व में नहीं आती। नैतिकता कोई यांत्रिक क्रिया नहीं है, न ही यह विवशता की उपज है। नैतिकता का जन्म ‘स्वतंत्रता’ की कोख से होता है। जब तक किसी व्यक्ति के पास ‘गलत’ करने का पूर्ण विकल्प, साधन और शक्ति न हो, तब तक उसके ‘सही’ करने का कोई नैतिक मूल्य नहीं है। अंधकार की अनुपस्थिति में प्रकाश का क्या महत्व? ठीक उसी प्रकार, अनैतिकता के विकल्प की अनुपस्थिति में नैतिकता का कोई अर्थ नहीं रह जाता। यह निबंध इस गहन दार्शनिक विचार का विश्लेषण करेगा कि नैतिकता मजबूरी (COMPULSION) का नाम नहीं, बल्कि एक सचेत चुनाव (CONSCIOUS CHOICE) का नाम है।
दर्शनशास्त्र का दृष्टिकोण: ‘चाहिए‘ का अर्थ है ‘कर सकते हैं‘
पाश्चात्य दर्शन के पितामहों में से एक, इमैनुएल कांट (IMMANUEL KANT) ने इस सिद्धांत को बहुत स्पष्टता से रखा है: “OUGHT IMPLIES CAN” (चाहिए का अर्थ है कि आप कर सकते हैं)। इसका अर्थ है कि किसी व्यक्ति को नैतिक रूप से जिम्मेदार केवल तभी ठहराया जा सकता है जब उसके पास कार्य करने की स्वतंत्रता हो। मान लीजिए, एक बैंक में डकैती हो रही है और डकैत ने कैशियर की कनपटी पर बंदूक रखकर तिजोरी खोलने को कहा। कैशियर तिजोरी खोल देता है। क्या हम कहेंगे कि कैशियर बेईमान है? नहीं, क्योंकि यहाँ उसके पास ‘विकल्प’ नहीं था। नैतिकता वहीं शुरू होती है जहाँ विवशता समाप्त होती है। यदि उसी कैशियर के पास मौका होता कि वह बिना किसी खतरे के थोड़ा पैसा अपनी जेब में डाल ले, और तब वह ऐसा न करता, तो वह नैतिक कहलाता। अस्तित्ववादी दार्शनिक ज्यां-पॉल सार्त्र (JEAN-PAUL SARTRE) ने इसे और आगे बढ़ाया। उनका कहना था कि मनुष्य “स्वतंत्र होने के लिए अभिशप्त है” (CONDEMNED TO BE FREE)। हम हर पल चुनाव कर रहे हैं। यहाँ तक कि ‘चुनाव न करना’ भी एक चुनाव है। नैतिकता इसी सतत चुनाव की प्रक्रिया में निहित है।
प्लेटो और गाइजीज की अंगूठी (RING OF GYGES)
महान यूनानी दार्शनिक प्लेटो ने अपनी पुस्तक ‘द रिपब्लिक’ में ‘रिंग ऑफ गाइजीज’ की कथा का उल्लेख किया है। यह कथा एक गड़रिए की है जिसे एक ऐसी जादुई अंगूठी मिल जाती है जिसे पहनकर वह अदृश्य हो सकता है। अब उसके पास अदृश्य होकर राजा को मारने, रानी को अपनाने और धन चुराने की असीमित शक्ति है; और उसे कोई पकड़ नहीं सकता। प्लेटो प्रश्न पूछते हैं: “क्या ऐसा कोई व्यक्ति होगा जो इस असीमित शक्ति (अदृश्यता) और दंड के भय से मुक्ति (IMPUNITY) के बावजूद न्यायपूर्ण बना रहेगा?” यही नैतिकता की असली परीक्षा है। जब समाज की पुलिस, कानून, और प्रतिष्ठा का डर समाप्त हो जाए, और आपके पास केवल आपकी अंतरात्मा और ‘विकल्प’ हो; तब आप क्या चुनते हैं? समाज में अधिकांश लोग कानून के डर से अच्छे बने रहते हैं, वे ‘नैतिक’ नहीं हैं, वे केवल ‘कानून का पालन करने वाले’ (LAW ABIDING) हैं। नैतिक वह है जो गाइजीज की अंगूठी पहनने के बाद भी चोरी न करे।
शक्ति और संयम: मर्यादा पुरुषोत्तम का उदाहरण
भारतीय संस्कृति में भगवान राम को ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ कहा जाता है। ‘पुरुषोत्तम’ का अर्थ है पुरुषों में उत्तम, लेकिन यह उत्तमता आई कहां से? क्या शक्तिहीनता से? नहीं। राम के पास रावण को एक पल में भस्म करने की शक्ति थी, उनके पास समुद्र को सुखाने का ब्रह्मास्त्र था। लेकिन अपार शक्ति होते हुए भी उन्होंने वनवास स्वीकार किया, बाली का वध नियमों के तहत किया (जो उस समय के युद्ध नियमों का हिस्सा था), और रावण को भी अंतिम समय तक संधि का विकल्प दिया। नैतिकता शक्तिहीन का हथियार नहीं है; यह शक्तिवान का आभूषण है। एक कमजोर व्यक्ति जो किसी का बुरा नहीं कर सकता, उसका भला होना उसकी ‘सज्जनता’ नहीं, उसकी ‘अक्षमता’ (INABILITY) है। असली नैतिकता उस कोबरा सांप जैसी है जो अपना फन फैलाए बैठा है, जिसके पास विष है, पर जो काट नहीं रहा क्योंकि उसने ‘अहिंसा’ को चुना है।
आधुनिक कॉर्पोरेट जगत: लालच बनाम निष्ठा
आज के दौर में यह विषय अत्यंत प्रासंगिक है। एक सरकारी कार्यालय का उदाहरण लें।
- परिस्थिति 1: एक क्लर्क है जिसके विभाग में रिश्वत का कोई चलन नहीं है, सीसीटीवी कैमरे लगे हैं, और बॉस बहुत सख्त है। वह रिश्वत नहीं लेता। क्या वह ईमानदार है? शायद नहीं, वह केवल डरा हुआ है।
- परिस्थिति 2: एक उच्च अधिकारी है। उसकी मेज पर एक फाइल पड़ी है। उसे पास करने पर उसे 5 करोड़ रुपये मिल सकते हैं। कमरे में कोई कैमरा नहीं है। देने वाला व्यक्ति अत्यंत विश्वासपात्र है, बात कभी बाहर नहीं आएगी। उसे पैसों की सख्त जरूरत भी है। यहाँ उसके पास पूर्ण ‘विकल्प’ है। उसके पास ‘जरूरत’ भी है और ‘गोपनीयता’ भी। इस क्षण में, जब वह कलम उठाकर फाइल पर ‘अस्वीकृत’ (REJECTED) लिखता है, तब नैतिकता का जन्म होता है। वह 5 करोड़ का नुकसान सहकर अपनी निष्ठा (INTEGRITY) को चुनता है। यह चुनाव ही उसे नैतिक बनाता है।
डिजिटल युग का विरोधाभास: सुलभ अनैतिकता
इंटरनेट ने हमारे सामने विकल्पों की बाढ़ ला दी है, और विडंबना यह है कि इसने ‘गलत’ को चुनना बहुत आसान (CHEAP AND ACCESSIBLE) बना दिया है। पहले अनैतिक होने के लिए मेहनत करनी पड़ती थी, जोखिम उठाना पड़ता था। आज:
- आप घर बैठे ‘फेक न्यूज’ फैलाकर दंगे भड़का सकते हैं (बिना अपनी पहचान बताए)।
- आप किसी की मेहनत से बनाई फिल्म या किताब को टेलीग्राम से मुफ्त में डाउनलोड कर सकते हैं (बौद्धिक संपदा की चोरी)।
- आप डार्क वेब पर जाकर अवैध सामग्री खरीद सकते हैं।
जब ‘पाप’ एक क्लिक की दूरी पर हो, और ‘पुण्य’ के लिए इंद्रियों पर संयम रखना पड़े, तब चरित्र की असली परीक्षा होती है। क्या आप इंटरनेट पर भी उतने ही सभ्य हैं जितने ड्राइंग रूम में? जब आप ‘एनोनिमस’ (अनाम) होते हैं, तब आप क्या चुनते हैं; गाली देना या तर्क करना? यह ‘डिजिटल नैतिकता’ (DIGITAL ETHICS) आज के युग की सबसे बड़ी चुनौती है।
दुविधा (ETHICAL DILEMMA) में चरित्र का निखार
नैतिकता काले और सफेद (BLACK AND WHITE) के बीच का चुनाव नहीं है; यह अक्सर दो सही या दो गलत रास्तों के बीच का चुनाव होता है। इसे ही ‘धर्मसंकट’ या ETHICAL DILEMMA कहते हैं। महाभारत में अर्जुन और कर्ण, दोनों के सामने विकल्प थे।
- कर्ण का विकल्प: कर्ण के पास अपनी माता कुंती के पास जाने और पांडवों के पक्ष में युद्ध करने का विकल्प था। यह धर्म (सत्य) का पक्ष था। लेकिन उन्होंने मित्रता (दुर्योधन) को चुना। यह एक चुनाव था जिसने उन्हें ‘दानवीर’ होते हुए भी अधर्म के पक्ष में खड़ा कर दिया।
- युधिष्ठिर का विकल्प: द्यूत क्रीड़ा के समय युधिष्ठिर के पास रुकने का विकल्प था, लेकिन वे ‘क्षत्रिय धर्म’ (आह्वान अस्वीकार न करना) और ‘जुए की लत’ के बीच के सूक्ष्म विकल्प में फंस गए।
आज एक डॉक्टर के पास विकल्प होता है: वह मरीज को महंगी ब्रांडेड दवा लिखे (जिसमें उसे कमीशन और विदेशी ट्रिप मिले) या सस्ती जेनरिक दवा लिखे (जिससे मरीज का भला हो)। मरीज को चिकित्सा विज्ञान का ज्ञान नहीं है, वह डॉक्टर को भगवान मानता है। यहाँ डॉक्टर के पास मरीज के विश्वास का फायदा उठाने का पूरा ‘विकल्प’ है। हिप्पोक्रेटिक शपथ (HIPPOCRATIC OATH) कागज पर नहीं, डॉक्टर के विवेक में लिखी होती है। जब वह कमीशन ठुकराता है, तब वह डॉक्टर से ‘हीलर’ (HEALER) बनता है।
लोकतंत्र: विकल्पों का महापर्व
लोकतंत्र और कुछ नहीं, बल्कि ‘सामूहिक नैतिकता’ का एक प्रयोग है। तानाशाही में नागरिकों के पास विकल्प नहीं होता, इसलिए वहां की जनता को नैतिक या अनैतिक नहीं कहा जा सकता। लेकिन लोकतंत्र में हमारे पास अपना शासक चुनने, अपनी आवाज उठाने, या नोटा (NOTA) दबाने का विकल्प होता है। जब एक मतदाता जाति, धर्म, या शराब की बोतल के लालच में वोट देता है, तो वह अपने ‘विकल्प’ का अनैतिक उपयोग कर रहा है। जब वह एक अपराधी को संसद भेजता है, तो यह उस मतदाता की नैतिकता की विफलता है। लोकतंत्र नागरिकों को हर 5 साल में अपनी नैतिकता साबित करने का एक विकल्प देता है।
निष्कर्ष: विकल्प ही अग्नि है
निष्कर्षतः, हम कह सकते हैं कि नैतिकता एक निष्क्रिय गुण (PASSIVE VIRTUE) नहीं है, यह एक सक्रिय क्रिया (ACTIVE VERB) है। ईमानदारी वह नहीं है जो आप तब दिखाते हैं जब दुनिया आपको देख रही हो; ईमानदारी वह है जो आप तब ‘चुनते’ हैं जब आपके पास बेईमान होने का पूरा, सुरक्षित और लाभकारी मौका हो। जीवन आपको बार-बार ऐसे चौराहों पर खड़ा करेगा जहाँ एक तरफ आसान, लुभावना लेकिन गलत रास्ता होगा, और दूसरी तरफ कठिन, पथरीला लेकिन सही रास्ता होगा। उस क्षण, आपकी शिक्षा, आपकी डिग्रियां, आपका पद; सब गौण हो जाएंगे। केवल एक चीज मायने रखेगी: “आपका विकल्प”। विकल्प ही वह भट्टी है जिसमें तपकर नैतिकता का कच्चा लोहा, चरित्र का फौलाद बनता है। बिना विकल्प के हम प्रोग्राम किए गए रोबोट हो सकते हैं, आज्ञाकारी गुलाम हो सकते हैं, लेकिन ‘मनुष्य’ नहीं हो सकते। और एक नैतिक मनुष्य होना, अस्तित्व की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
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